Premchand Stories – प्रेमचंद की कहानियाँ पढ़े हिंदी में ✍😍

प्रिय दोस्तों मै  आज आपके लिए लेकर आया हूँ Premchand Stories |  ये कहानियाँ बहुत रोचक और मज़ेदार है | इन कहानियो से हमें जीवन की नैतिक शिक्षा का ज्ञान होता है | आईये शुरू करते है  Premchand Stories

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 लाग-डाट – Premchand Stories In Hindi 🕺

जोखू  भगत और बेचन चौधरी में तीन पीढ़ियों से अदावत चली आती  थी। कुछ डॉड-पेड़ का झगड़ा था। उनके परदादाओं में कई बार खून-खच्चर हुआ। बाप-दादाओं के समय से मुकदमेबाजी शुरू हुई। दोनों कई बार हाईकोर्ट तक गए। लड़कों के समय में संग्राम की भीषणता और भी बढ़ी, यहाँ तक कि दोनों ही अशक्त हो गए। पहले दोनों इसी गाँव में आधेआधे के हिस्सेदार थे। अब उनके पास उस झगड़ने वाले खेत को छोड़कर एक अंगुल जमीन न थी। भूमि गईधन गया, मान -मर्यादा गईलेकिन वह विवाद ज्यों-का-त्यों बना रहा। हाईकार्ट के धुरंधर नीति एक मामूली सा झगड़ा तय
न कर सके।

इन दोनों सज्जनों ने गाँव को दो विरोधी दलों में विभक्त कर दिया था। एक दल की भंग बूटी चौधरी के द्वार पर छनती तो दूसरे दल के चरस-गांजे के दम भगत के द्वार पर लगते थे। स्त्रियों और बालकों के भी दो दल हो गए थे। यहाँ तक कि दोनों सज्जनों के सामाजिक और धार्मिक विचारों में भी विभाजक रेखा खिंची हुई थी। चौधरी कपड़े पहने सत्तू खा लेते और भगत को ढोंगी कहते। भगत बिना कपड़े उतारे पानी भी न पीते और चौधरी को भ्रष्ट बतलाते। भगत सनातनधर्मी बने तो चौधरी ने आर्यसमाज का आश्रय लिया। जिस बजाज, पंसारी या कुंजड़े से चौधरी सौदे लेतेउसकी ओर भगतजी ताकना भी पाप समझते थे और भगतजी की हलवाई की मिठाइयाँ, उनके ग्वाले का दूध और तेली का तेल चौधरी के लिए त्याज्य थे। यहाँ तक कि उनके अरोग्यता के सिद्धांतों में भी भिन्नता थी। भगतजी वैद्यक के कायल थे, चौधरी यूनानी प्रथा के मानने वाले। दोनों चाहे रोग से मर जाते, पर अपने सिद्धांतों को न तोड़ते |

जब देश में राजनैतिक आंदोलन शुरू हुआ तो उसकी भनक उस गाँव में आ पहुंची। चौधरी ने आंदोलन का पक्ष लिया, भगत उनके विपक्षी हो गए एक सज्जन ने आकर गाँव में किसान-सभा खोली। चौधरी उसमें शरीक हए. भगत अलग रहे। जागृति और बढ़ीस्वराज्य की चर्चा होने लगी। चौधरी स्वराज्यवादी हो गए, भगत ने राजभक्ति का पक्ष लिया। चौधरी का घर स्वराज्यवादियों का अड्डा बन गया, भगत का घर राजभक्तों का क्लब बन गया।

चौधरी जनता में स्वराज्यवाद का प्रचार करने लगे”मित्रो, स्वराज्य का अर्थ है अपना राज। अपने देश में अपना राज हो, वह अच्छा है कि किसी दूसरे का राज हो? जनता ने कहा”अपना राज हो, वह अच्छा है।चौधरी”तो यह स्वराज्य कैसे मिलेगा? आत्मबल से, पुरुषार्थ सेमेल  एक-दूसरे से ब्ष करना छोड़ दो।

अपने झगड़े आप मिलकर निपटा लो। एक शंका, “आप तो नित्य अदालत में खड़े रहते हैं।”चौधरी”हाँ, पर आज से अदालत जाऊँ तो मुझे गहत्या का पाप लगे तुम्हें चाहिए कि तुम अपनी गाढ़ी कमाई अपने बाल-बच्चों को खिलाओ और बचे तो परोपकार में लगाओ। वकील-मुख्तारों की जेब क्यों भरते हो, थानेदार को घूस क्यों देते हो, अमलों की चिरौरी क्यों करते हो?

पहले हमारे लड़के अपने धर्म की शिक्षा पाते थे, वह सदाचारी, त्यागी, पुरुषार्थ बनते थे। अब वह विदेशी मदरसों में पढ़कर चाकरी करते हैं, घूस खाते हैं, शौक करते हैं, अपने देवताओं और पितरों की निंदा करते हैं, सिगरेट पीते हैं, साल बनाते हैं और हाकिमों की गोड़रिया करते हैं। क्या यह हमारा कर्तव्य नहीं है कि हम अपने बालकों को धर्मानुसार शिक्षा दें।”

Premchand Stories Hindi Me

जनता, “ चंदा करके पाठशाला खोलनी चाहिए।” चौधरी”हम पहले मदिरा को छूना पाप समझते थे। अब गाँव-गाँव और गली गली में मदिरा की दुकानें हैं। हम अपनी गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपए
गाँजे-शराब में उड़ा देते हैं।”

जनता”जो दारू-भाँग पिए उसे डाँट लगानी चाहिए” चौधरीहमारे दादा-बाबा, छोटेबड़े सब गाढ़ागजी पहनते थे। हमारी दादियाँ-नानियाँ चरखा काता करती थीं। सब धन देश में रहता थाहमारे जुलाहे भाई चैन की वंशी बजाते थे। अब हम विदेश के बने हुए महीन रंगीन कपड़ों पर जान देते हैं। इस तरह दूसरे देश वाले हमारा धन ढो ले जाते हैं; बेचारे जुलाहे कंगाल हो गएक्या हमारा यही धर्म है कि अपने भाइयों की थाली छीनकर दूसरों के सामने रख है।

जनता,” का कहीं मिलता ही नहीं। , ” अपने घर का बना है या गाड़ा पहनी, अदालतों को त्यागी, नशबाजी छोड़ो, अपने लड़कों को वर्ष का लिखा, मैल ये रही, बस यही वन्य है। जो लोग कहते हैं कि स्वराज्य के लिए खून की नदी बहगी, वे पागल हैं, उनकी बातों पर ध्यान मत दी।’

जनता ये सब बातें चाव से सुनती थी। दिलोदित श्रोताओं की संख्या बढ़ती जाती थी। चौधरी के सब श्रद्धाभाजन बन गए।

भगतजी भी राजभक्ति का उपदेश करने लगे“ भाइयों, राजा का काम राज करना और प्रजा का काम उसकी आज्ञा का पालन करना है। इसी को राजभक्ति कहते हैं और हमारे धार्मिक ग्रंथों में हमें इसी राजभक्ति की शिक्षा दी गई है। राजा ईश्वर का प्रतिनिधि है, उसकी आज्ञा के विरुद्ध चलना महान
पातक है। राजविमुख प्राणी नरक का भागी होता है।” एक शंका”राजा को भी तो अपने धर्म का पालन करना चाहिए?

दूसरी शंका हमारे राजा तो नाम के , असली राजा तो विलायत के बनिए महाजन हैं। तीसरी शंका, “बनिए धन कमाना जानते हैं, राज करना क्या जाने। भगत“लोग तुम्हें शिक्षा देते हैं कि अदालतों में मत जाओ, पंचायतों में मुकदमे ले जाओ, लेकिन ऐसे पंच कहाँ हैं, जा सच्चा न्याय करेंदूध का  दूध और पानी का पानी कर दें! यहाँ मुँह देखी बातें होंगी। जिनका कुछ दबाव है, उनकी जीत होगी, जिनका कुछ दबाव नहीं है, वह बेचारे मारे जाएंगे।

अदालतों में सब कारवाई कानून पर होती है, वहाँ छोटेबड़े सब बराबर हैं, शेर-बकरी एक घाट पर पानी पीते हैं।” दूसरी शंका, “अदालतों का न्याय कहने को ही है, जिसके पास बने हुए गवाह और दाँवपेंच खेले हुए वकील होते हैं, उसी की जीत होती है, झूठेसच्चे की परख कौन करता है? हाँ, हैरानी अलबत्ता होती है।’

भगत, “कहा जाता है कि विदेशी चीजों का व्यवहार मत करा। यह गरीबों के साथ घोर अन्याय है। हमको बाजार में जो चीज सस्ती और अच्छी मिले, वह लेनी चाहिएचाहे स्वदेशी हो या विदेशी। हमारा पैसा खेत में नहीं आता है कि उसे रद्दीफडी स्वदेशी चीजों पर फेंकें।” एक शंकाअपने देश में रहता है, दूसरों के हाथ में तो नहीं जाता।

तो दूसरी शंका,” अपने घर में अच्छा खाना मिले तो क्या विजातियों के घर का अच्छा भोजन खाने लगेंगे?”

भगत, “लोग कहते हैं, लड़कों को सरकारी मदरसों में मत भेजोसरकारी मदरसों में न पढ़ते तो आज हमारे भाई बड़ीबड़ी नौकरियाँ कैसे पाते बड़े बड़े कारखाने कैसे बना लेते? बिना नई विद्या पढ़े अब संसार में निर्वाह नहीं हो सकता, पुरानी विद्या पढ़कर पत्र देखने और कथा बाँचने के सिवाय और क्या
आता है? राजकाज क्या पट्टी-पोथी बाँचने वाले लोग करेंगे?”

एक शंका, “हमें राज-काज नहीं चाहिए। हम अपनी खेती-बाड़ी ही में मगन हैं, किसी के गुलाम तो नहीं?” दूसरी शंका”जो विद्या घमंडी बना दे, उससे पूर्व ही अच्छानई विद्या पढ़कर तो लोग सूटबूट, घड़ी-छड़ी, हैट-कोट लगाने लगते हैं और अपने  शौक के पीछे देश का धन विदेशियों की जेब में भरते हैं। ये देश के द्रोही भगत,“गाँजा-शराब की ओर आजकल लोगों की कड़ी निगाह है। नशा बुरी लत है, इसे सब जानते हैं। सरकार को नशे की दुकानों से करोड़ों रुपए साल की आमदनी होती है। अगर दुकानों में न जाने से लोगों की नशे की लत छूट जाए तो बड़ी अच्छी बात है। वह दुकान पर न जाएगा तो चोरी छिपे किसी-न-किसी तरह दूने-चौगुने दाम देकरसजा काटने पर तैयार होकर अपनी लत पूरी करेगा।

तो ऐसा काम क्यों करो कि सरकार का नुकसान अलग हो और गरीब रैयत का नुकसान अलग हो और फिर किसीकिसी को नशा खाने से फायदा होता है। मैं ही एक दिन अफीम न खाऊँ तो गाँठों में दर्द होने लगे दम उखड़ जाए और सर्दी पकड़ ले।” एक आवाज’शराब पीने से बदन में फुरती आ जाती है।”
एक शंका, “सरकार अधर्म से रुपया कमाती है। यह उचित नहीं अधके राज में रहकर प्रजा का कल्याण कैसे हो सकता है?”

दसरी शंका, “पहले दारू पिलाकर पागल बना दियालत पडी तो पैसे की चाट हुई। इतनी मजदूरी किसको मिलती है कि रोटी-कपड़ा भी चले और दारू-शराब भी उड़े? या तो बाल-बच्चों को भूखों मारो या चोरी करो ,जुआ खेलो और बेईमानी करोशराब की दुकान क्या है? हमारी गुलामी का अड्डा
की जगह भी न मिलती। दिनोदिन चौधरी का मान बढ़ने लगा। उनके यहाँ नित्य पंचायतों में राष्ट्रोन्नति की चर्चा रहती, जनता को इन बडा बातों में आनंद और उत्साह होने लगाउनके राजनैतिक ज्ञान की वृद्धि होने लगी।

वह अपना गौरव और महत्व समझने लगेउन्हें सत्ता का अनुभव होने लगा। निरंकुशता और उनकी तैयारियाँ चढ़ने लगीं। उन्हें स्वतंत्रता का अन्याय पर अब स्वाद मिला। घर की रुई, घर का सूत, घर का कपड़ाघर का भोजनघर की अदालत, न पुलिस का भयन अमला की खुशामदसुख और शांति से जीवन व्यतीत करने लगे। कितनों ही ने नशेबाजी छोड़ दी और सद्भावों की एक लहर सी दौड़ने लगी।

लेकिन भगतजी इतने भाग्यशाली न थे। जनता को दिनोदिन उनके उपदेशों से अरुचि होती जाती थी। यहाँ तक कि बहुधा उनके श्रोताओं में पटवारी चौकीदार, मुदर्रिस और इन्हीं कर्मचारियों के मित्रों के अतिरिक्त और कोई न होता था। कभीकभी बड़े हाकिम भी आ निकलते और भगतजी का बड़ा आदर-सत्कार करते, जरा देर के लिए भगतजी के आंसू पोंछ जाते, लेकिन क्षण भर का सम्मान आठों पहर के अपमान की बराबरी कैसे करता! जिधर निकल जाते उधर ही उंगलियां उठने लगतीं। कोई कहताखुशामदी टटू है, कोई कहता, खुफिया पुलिस का भेदी है।

भगतजी अपने प्रतिद्वंद्वी की बड़ाई और अपनी लोकनिंदा पर दाँत पीस-पीसकर रह जाते थे। जीवन में यह पहला ही अवसर था कि उन्हें सबके सामने नीचा देखना पड़ा। चिरकाल से जिस कुलमर्यादा की रक्षा करते आए थे और जिस पर अपना सर्वस्व अर्पण कर चुके थे, वह धूल में मिल गई। यह दाहमय चिंता उन्हें एक क्षण के लिए चैन न लेने देती। नित्य समस्या सामने रहती कि अपना खोया हुआ सम्मान
क्यों कर पाऊँ अपने प्रतिपक्षी को क्योंकर पददलित काँ, कैसे उसका गरूर तोहूं? अंत में उन्होंने सिंह को उसी की माँद में पछाड़ने का निश्चय किया संध्या का समय था। चौधरी के द्वार पर एक बड़ी सभा हो रही थी।

आसपास के गाँव के किसान भी आ गए। हजारों आदमियों की भीड़ थी। चौधरी उन्हें स्वराज्यविषयक उपदेश दे रहे थे। बार-बार भारतमाता की जयजयकार की ध्वनि उठती थी। एक ओर स्त्रियों का जमाव था। चौधरी ने अपना उपदेश समाप्त किया और अपनी बैठेस्वयंसेवकों ने जगह पर । स्वराज्य फंड के लिए चंदा जमा करना शुरू किया कि इतने में भगतजी न जाने किधर से लपके हुए आए और श्रोताओं के सामने खड़े होकर उच्च स्वर में बोले” भाइयोमुझे यहाँ देखकर अचरज मत करोमैं स्वराज्य का नहीं हैं। ऐसा पतित कौन प्राणी होगा, जो स्वराज्य का निंदक हो, लेकिन इसके प्राप्त करने नहीं है, जो चौधरी ने बताया है और जिस पर तम का वह उपाय लोग लट्टू हो रहे हो।

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जब आपस में फूट और रार है, पंचायतों से क्या होगा जब विलासिता का भूत सिर पर सवार है तो नशा कैसे छूटेगा, मदिरा की दुकानों का बहिष्कार कैसे होगा? सिगरेट, साबुनमोजे, बनियान, अद्धीतंजेब से
कैसे पिंड छूटेगा? जब रोब और हुकूमत की लालसा बनी हुई है तो सरकारी मदरसे कैसे छोड़ोगेविधर्मी शिक्षा की बेड़ी से कैसे मुक्त हो सकोगे? स्वराज लेने का केवल एक ही उपाय है और वह आत्मसंयम है। यही महौषधि तुम्हारे समस्त रोगों को समूल नष्ट करेगी।

आत्मा को बलवान् बनाओ, इंद्रियों को साधो, मन को वश में करोतुममें भ्रातृभाव पैदा होगा, तभी वैमनस्य मिटेगा, तभी ईष्र्या और (ष का नाश होगा, तभी भोग-विलास से मन हटेगा तभी नशेबाजी का दमन होगा। आत्मबल के बिना स्वराज्य कभी उपलब्ध न होगा। स्वयंसेवा सब पापों का मूल है। यही तुम्हें अदालतों में ले जाता है, यही तुम्हें विधर्मी शिक्षा का दास बनाए हुए है। इस पिशाच को आत्मबल से मारो और तुम्हारी कामना पूरी हो जाएगी। सब जानते हैं, मैं चालीस साल से अफीम का सेवन करता हूँ। आज से मैं अफीम को गऊ-रक्त समझता हूँ।

चौधरी से मेरी तीन पीढ़ियों की अदावत है। आज से चौधरी मेरे भाई हैं। आज से मुझे या मेरे घर के किसी प्राणी को घर के कते सूत से बुने हुए कपड़े के सिवाय और कुछ पहनते देखो तो जो दंड चाहो दो। बस मुझे यही कहना है, परमात्मा हम सबकी इच्छा पूरी करे”

यह कहकर भगतजी घर की ओर चले कि चौधरी दौड़कर उनके गले से लिपट गएतीन पुश्तों की अदावत एक क्षण में शांत हो गई उस दिन से चौधरी और भगत साथ-साथ स्वराज्य का उपदेश करने लगे उनमें गाढ़ी मित्रता हो गई और यह निश्चय करना कठिन था कि दोनों में जनता किसका अधिक सम्मान करती है।

प्रतिद्वंद्विता वह चिंगारी थी, जिसने दोनों पुरुषों के हृदय-दीपक को प्रकाशित कर दिया था।

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Premchand Stories – रामलीला 🕺💪

इधर एक मुद्दत से रामलीला देखने नहीं गया। बंदरों के भदे चेहरे लगाए. आधी टगों का पजामा और काले रंग का ऊँचा कुरता पहने आदमियों को दौड़ते, हू-हू करते देखकर अब हँसी आती है, मजा नहीं आताकाशी की रामलीला। जगविख्यात है। सुना है, लोग दूरदूर से देखने आते हैं। मैं भी बड़े शौक से गया, पर मुझे तो वहाँ की लीला और किसी व देहात की लीला में कोई अंतर न दिखाई दिया।

हाँ,रामनगर की लीला में कुछ साज-सामान अच्छे हैं। राक्षसों और बंदरों के चेहरे पीतल के हैं, गदाएँ भी पीतल की हैं, कदाचित् वनवासी नाताओं के मुकुट सच्चे काम के हों, लेकिन साज-सामान के सिवा वहाँ भी वही हू-हू के सिवा और कुछ नहींफिर भी लाखों आदमियों की भीड़ लगी रहती है। लकिन एक जमाना वह था, जब मुझे भी रामलीला में आनंद आता था।

आनंद तो बहुत हलका सा शब्द है। वह आनंद उन्माद से कम न था। संयोगवश उन दिनों मेरे घर से बहुत थोड़ी दूर रामलीला का मैदान था और जिस घर में लीला पात्रों का रूप-रंग भरा जाता था, वह तो मेरे घर से बिलकुल मिला हुआ था। दो बजे दिन से पात्रों की सजावट होने लगती थी। मैं दोपहर ही से वहाँ जा बैठता और जिस उत्साह से दौड़-दौड़कर छोटे-मोटे काम करता,उस उत्साह से तो आज अपनी पेंशन लेने भी नहीं जाता।

एक कोठरी में राजकुमारों का श्रृंगार होता था। उनकी देह में रामरज पीसकर पोती जाती, मुँह पर पाउडर लगाया जाता और पाउडर के ऊपर लालहरे, नीले रंग की सुंदकियाँ लगाई जाती थीं। सारा माथा, भौंहें, गालठोड़ी बुंदकियों से रच उठती थीं। एक ही आदमी इस काम में कुशल था। वही बारी-बारी से तीनों पात्रों का श्रृंगार करता था। रंग की प्यालियों में पानी लाना, रामरज पीसनापंखा झलना मेरा काम था।

जब इन तैयारियों के बाद विमान निकलता, तो उस पर रामचंद्रजी के पीछे बैठकर मुझे जो उल्लासजो गई, जो रोमांच होता था, अब वह लाट साहब के दरबार में कुरसी पर बैठकर भी नहीं होता। एक बार होम-मेंबर साहब ने व्यवस्थापक-सभा में मेरे एक प्रस्ताव का अनुमोदन था, उस वक्त मुझे किया कुछ उसी तरह का उल्लास, गर्व और रोमांच हुआ था। हाँ, एक बार जब मेरा ज्येष्ठ पुत्र नायब तहसीलदारी में नामजद हुआ, तब भी ऐसी ही तरंगें मन में उठी थीं पर इनमें और उस बाल-विह्वलता में बड़ा अंतर है।

तब ऐसा मालूम होता था कि मैं स्वर्ग में बैठा हूँ।  निषाद नौका-लीला का दिन था। मैं दो-चार लड़कों के बहकाने में आकर गुल्ली-डंडा खेलने गया था। आज श्रृंगार देखने न गयाविमान भी निकला, पर मैंने खेलना न छोड़ा। मुझे अपना दाँव लेना था। अपना दाँव छोड़ने के लिए उससे कहीं बढ़कर आत्मत्याग की जरूरत थी, जितना मैं कर सकता था। अगर दाँव देना होता तो मैं कब का भाग खड़ा होता, लेकिन पदाने में कुछ और ही बात होती है। खैरदाँव पूरा हुआ।

अगर मैं चाहता तो धाँधली करके दसपाँच मिनट और पदा सकता था, इसकी काफी गुंजाइश थी, लेकिन अब इसका मौका न था। मैं सीधे नाले की तरफ दौड़ा। विमान जलतट पर पहुंच चुका था। मैंने दूर से देखा, मल्लाह किश्ती लिये आ रहा है। दौड़ा, लेकिन आदमियों की भीड़ म दौड़ना कठिन था। आखिर जब मैं भीड़ हटाता, प्राण-पण से आगे बढ़ता घाट पर पहुँचा तो निषाद अपनी नौका खोल चुका था।

रामचंद्र पर मेरी कितनी श्रद्धा थी। अपने पाठ की चिंता न करके उन्हें पढ़ा दिया करता थाजिससे वह फेल न हो जाएँ। मुझसे उम्र ज्यादा होने पर भी वह नीची कक्षा में पढ़ते थे, लेकिन वही रामचंद्र नौका पर बैठे इस तरह मुंह फेरे चले जाते , मानो मुझसे जान-पहचान ही नहीं। नकल में भी असल की कुछ न कुछ बू आ ही जाती है। भक्तों पर जिनकी निगाह सदा ही तीखी रही है, वह मुझे क्यों उबारते!

मैं विकल होकर उस बछड़े की भाँति कूदने लगाजिसकी गरदन पर पहली बार जुआ रखा गया हो। कभी लपककर नाले की ओर जाता, कभी किसी सहायक की खोज में पीछे की तरफ दौड़ता, पर सब-के-सब अपनी धुन में मस्त , मेरी चीखपुकार किसी के कानों तक न पहुंचीतब से बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ झेल,
पर उस समय जितना दु:ख हुआ, उतना फिर कभी न हुआ।

Aao Read Kar Rhe H Premchand Stories In Hindi 

मैंने निश्चय किया था कि अब रामचंद्र से न कभी बोहँगान कभी खाने की कोई चीज ही ढूंगा, लेकिन ज्यों ही नाले को पार करके वह पुल की ओर लौटे, मैं दौड़कर विमान पर चढ़ गया और ऐसा खुश हुआ, मानो कोई बात ही रामलीला समाप्त हो गई थी। राजगद्दी होने वाली थी, पर न जाने क्यों देर हो रही थी। शायद चंदा कम वसूल हुआ था। रामचंद्र की इन दिनों कोई बात भी न था। न ही घर जाने की मिलती थी और न ही भोजन का प्रबंध पूछता छुट्टी होता थाको मिलता ।

साहब के यहाँ से सीदा कोई तीन बजे दिन था, बाकी चौधरी सारे दिन कोई पानी को नहीं पूछता। लेकिन मेरी श्रद्धा अभी तक ज्यों-की-त्यों। थी। मेरी दृष्टि में वह अब भी रामचंद्र ही थे। घर पर मुझे खाने की कोई चीज मिलती, वह लेकर रामचंद्र को दे आताउन्हें खिलाने में मुझे जितना आनंद मिलता था, उतना आप खा जाने में भी कभी न मिलता। कोई मिठाई या फल पाते ही मैं बेतहाशा चौपाल की ओर दौडता।

अगर रामचंद्र वहाँ मिलते तो चारों ओर तलाश करता और जब तक वह चीज उन्हें न खिला देता, चैन न आता था। खैरराजगद्दी का दिन आयारामलीला के मैदान में एक बड़ा सा शामियाना ताना गया। उसकी खूब सजावट की गई वेश्याओं के दल भी आ पहुँचे शाम को रामचंद्र की सवारी निकली और प्रत्येक द्वार पर उनकी आरती उतारी गई।

श्रद्धानुसार किसी ने रुपए दिएकिसी ने पैसेमेरे पिता पुलिस के आदमी थे, इसलिए उन्होंने बिना कुछ दिए ही आरती उतारी। उस वक्त मुझे जितनी लज्जा  आई उसे बयान नहीं कर सकता। मेरे पास उस वक्त संयोग से एक रुपया था।

मेरे मामाजी दशहरे के पहले आए थे और मुझे एक रुपया दे गए थे। उस रुपए को मैंने रख छोड़ा था।दशहरे के दिन भी उसे खर्च न कर सका। मैंने तुरंत वह रुपया लाकर आरती की थाली में डाल दिया। पिताजी मेरी ओर कुपित नेत्रों से देखकर रह गए। उन्होंने कुछ कहा तो नहीं, लेकिन मुँह ऐसा बना लिया जिससे प्रकट होता था कि मेरी इस धृष्टता से उनके रोब में बट्टा लग गयारात के दस बजते-बजते यह परिक्रमा पूरी हुई आरती की थाली रुपयों और पैसों से भरी हुई थी।

ठीक तो नहीं कह सकतामगर अब ऐसा अनुमान होता है कि चार-पाँच सौ रुपयों से कम न थे। चौधरी साहब इनसे कुछ ज्यादा ही खर्च कर चुके थे। उन्हें इसकी बड़ी फिक्र हुई कि किसी तरह कम-सेकम दो सौ रुपए और वसूल हो जाएँ और इसकी सबसे अच्छी तरकीब उन्हें यही मालूम हुई कि वेश्याओं द्वारा
महफिल में वसूली हो।

जब लोग आकर बैठ जाएँ और महफिल का रंग जम जाए, तो आबादीजानरसिकजनों की कलाइयाँ पकड़पकड़कर ऐसे हाव-भाव दिखाएँ कि लोग शरमाते- शरमाते भी कुछनकुछ दे ही मरें।आबादीजान और चौधरी साहब में सलाह होने लगी। मैं संयोग से उन दोनों प्राणियों की बातें सुन रहा था। चौधरी साहब ने समझा होगा कि यह लौंडा क्या मतलब समझेगापर यहाँ ईश्वर की दया से अक्ल के पुतल सारी दास्तान समझ में आती जाती थी।

चौधरी”सुनो आबादी जान यह तुम्हारी ज्यादती है। हमारा और तुम्हारा कोई पहला साबिका तो है नहीं। ईश्वर ने चाहा तो हमेशा तुम्हारा आना-जाना लगा रहेगा। अब की चंदा बहुत कम आया नहीं तो मैं तुमसे इतना इस रार न करता।”

आबादीजान”आप मुझसे भी जमींदारी चालें चलते हैं, क्यों? मगर यहाँ हुजूर की दाल न गलेगी। वाह! रुपए तो मैं वसूल करें और पूंछों पर ताव आप दें। कमाई का अच्छा ढंग निकाला है। इस कमाई से तो वाकई आप थोड़े दिनों में राजा हो जाएँगेउसके सामने जमींदारी झक मारेगी! बस कल ही से एक
चकला खोल दीजिएखुदा की कसम मालामाल हो जाइएगा।”

चौधरी, “तुम दिल्लगी करती हो और यहाँ काफिया तंग हो रहा है।” आबादीजान, “तो आप भी तो मुझी से उस्तादी करते हैं। यहाँ आप जैसे कइयों को रोज ढंगलियों पर नचाती हैं।”

चौधरी”आखिर तुम्हारी मंशा क्या है?” आबादीजान, “जो कुछ वसूल कहाँउसमें आधा मरा, आधा आपका लाइए, हाथ मारिए।”चौधरी, “यही सही।” आबादीजान“तो पहले मेरे सौ रुपए गिन दीजिए पीछे से आप अलसेट करने लगेंगे।”

चौधरी, “वह भी लोगी और यह भी।” आबादीजान,”अच्छा! ता क्या आप समझते थे कि अपनी उजरत छोड़ चूंगी? वाह री आपकी समझ! खूबक्यों न हो। दीवाना बकारे दरवेश हुशियार।” चौधरी, “तो क्या तुमने दोहरी फीस लेने की ठानी है?”

आबादीजान, “अगर आपको सौ दफे गरज हो तो। वरना मेरे सौ रुपए तो कहीं गए ही नहीं। मुझे क्या कुत्ते ने काटा है, जो लोगों की जेब में हाथ डालती ? चौधरी की एक न चली। आबादीजान के सामने दबना पड़ा। नाच शुरू हुआ। आबादीजान बला की शोख औरत थी। एक तो कमसिनउस पर हसीन
और उसकी अदाएँ तो इस गजब की थीं कि मेरी तबीयत भी मस्त हुई जाती थी।

आदमियों को पहचानने का गुण भी उसमें कुछ कम न था। जिसके सामने बैठ गई, उससे कुछनकुछ ले ही लिया। पाँच रुपए से कम तो शायद ही किसी  ने दिए हों। पिताजी के सामने भी वह बैठी। मैं मारे शरम के गड़ गया। जब उसने उनकी कलाई पकड़ीतब तो मैं सहम उठा। मुझे यकीन था कि पिताजी उसका हाथ झटक देंगे और शायद दुत्कार भी हैं, किंतु यह क्या हो रहा है ईश्वर।

मेरी औखें धोखा तो नहीं खा रही हैंपिताजी पूंछों में फंस रहे हैं। ऐसी मृदु हंसी उनके चेहरे पर मैंने कभी नहीं देखी थी। उनकी आंखों से अनुराग टपका पड़ता था। उनका एक-एक रोम पुलकित हो रहा थामगर ईश्वर ने मेरी लाज रख ली। वह देखो, उन्होंने धीरे से आबादीजान के कोमल हाथों से अपनी कलाई छुड़ा ली।

अरेयह फिर क्या हुआ? आबादी तो उनके गले में बाहें डाले देती है। अब पिताजी उसे जरूर पीटेंगे। चुडैल को जरा भी शरम नहीं। एक महाशय नेमुसकराकर कहा”यहाँतुम्हारी दाल न गलेगीआबादीजान!
और दरवाजा देखो बात तो इन महाशय ने मेरे मन की कही और बहुत ही उचित कहीलेकिन न जाने क्यों पिताजी ने उसकी ओर कुपित नेत्रों से देखा और पूंछों पर ताव दिया।

मुंह से तो वह कुछ न बोले, पर उनके मुख की आकृति चिल्लाकर सरोष शब्दों में कह रही थी, तू बनिया मुझे समझता क्या है? यहाँ ऐसे अवसर पर जान तक निसार करने को तैयार हैं। रुपए की हकीकत ही क्या! तेरा जी चाहे, आजमा ले।

तुझसे दूनी रकम न डायूँ तो मुंह न दिखाऊँ’ महान् आश्चर्यघोर अनर्थ अरे जमीन तू फट क्यों नहीं जाती। आकाश, तू फट क्यों नहीं पड़ता? अरेमुझे मौत क्यों नहीं आ जाती! पिताजी जेब में हाथ डाल रहे हैं। कोई चीज निकाली और सेठजी को दिखाकर आबादीजान को दे डाली। आह! यह तो अशरफी है।

चारों ओर तालियाँ बजने लगीं। सेठजी उल्लू बन गएपिताजी ने मुंह की खाईइसका निश्चय मैं नहीं कर सकता। मैंने केवल इतना देखा कि पिताजी ने एक अशरफी निकालकर आबादीजान को दी। उनकी आँखों में इस समय इतना गर्वयुक्त उल्लास था मानो उन्होंने हातिम की कब्र पर लात मारी हो। यही पिताजी हैं, जिन्होंने मुझे आरती में एक रुपया डालते देखकर मेरी ओर इस तरह से देखा था, मानो मुझे फाड़ ही खाएँगे।

मेरे उस परमोचित व्यवहार से उनके रोब फर्क आता था और इस समय इस घृणितकुत्सित और निदित व्यापार पर गर्व और आनंद फूले न समाते थे।

आबादीजान ने एक मनोहर मुसकान के साथ पिताजी को सलाम किया और आगे बढ़ी, मगर मुझसे वहाँ न बैठा गया। मारे शरम के मेरा मस्तक झुका जाता था, अगर मेरी आंखों देखी बात न होती, तो मुझे इस पर कभी ऐतबार न हाता। में बाहर जो कुछ देखता-सुनता था, उसकी रिपोर्ट अम्मा से जरूर करताथा यह ।

पर इस मामले को मैंने उनसे छिपा रखा। मैं जानता था, उन्हें बात सुनकर  बड़ा दु:ख होगा।
रात भर गाना होता रहातबले की धमक मेरे कानों में आ रही थी।जी चाहता था, चलकर देखें, पर साहस न था। मैं किसी को मुंह कैसे दिखाऊँगा? कहीं किसी ने पिताजी का जिक्र छेड़ दिया तो मैं क्या करेगा?
प्रातकाल रामचंद्र की विदाई होने वाली थी। मैं चारपाई से उठते ही आंखें मलता हुआ चौपाल की ओर भागा। डर रहा था कि कहीं रामचंद्र चले न गए हों। पहुंचा तो देखा, तवायफों की सवारियाँ जाने को तैयार हैं। बीसों आदमी हसरत नाक-मुंह बनाए उन्हें घेरे खड़े हैं।

मैंने उनकी ओर आख तक न उठाई। सीधा रामचंद्र के पास पहुँचा। लक्ष्मण और सीता बैठे रो रहे थे और रामचंद्र खड़े काँधे पर लुटिया-डोर डाले उन्हें समझा रहे थे। मेरे सिवा वहाँ और कोई न था। मैंने कुंठित स्वर में रामचंद्र से पूछा”क्या तुम्हारी विदाई हो गई?”

रामचंद्र”हाँ, हो तो गई। हमारी विदाई ही क्या? चौधरी साहब ने कह दिया,जाओ, चले जाते हैं।”क्या रुपया और कपड़े नहीं मिले?” “अभी नहीं मिलेचौधरी साहब कहते हैं, “इस वक्त बचत में रुपए नहीं
हैं, फिर आकर ले जाना।” कुछ नहीं मिला? ”

एक पैसा भी नहीं। कहते हैंकुछ बचत नहीं हुई। मैंने सोचा था कि कुछ रुपए मिल जाएँगे तो पढ़ने की किताबें ले गूंगा। सो कुछ न मिला। राह खर्च भी नहीं दिया। कहते हैं, कौन दूर है, पैदल चले जाओ।”
मुझे ऐसा क्रोध आया कि चलकर चौधरी को खूब आड़े हाथों टैं। वेश्याओं के लिए रुपए सवारियाँ सब कुछ पर बेचारे रामचंद्र और उनके साथियों के लिए भी नहीं जिन लोगों ने रात को आबादीजान पर दस-दस, बीस-बीस रुपए न्योछावर किए थे, उनके पास क्या इनके लिए दो-दो, चार-चार आने पैसे भी नहीं पिताजी ने भी आबादीजान को एक अशरफी दी थी।

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इनके नाम  पर क्या हैं मैं पिताजी के देते । दौड़ा हुआ पास गया । वह कहीं तफ्तीश पर जाने को तैयार खड़े थे। मुझे देखकर बोलेकहाँ घूम रहे हो? पढ़ने के वक्त तुम्हें घूमने की सूझती है।” मैंने कहा“गया था चौपाल। रामचंद्र विदा हो रहे थे। उन्हें चौधरी साहब ने कुछ नहीं दिया।”

“तो तुम्हें इसकी क्या फिक्र पड़ी है?” “वह जाएँगे कैसेउनके पास राह-खर्च भी तो नहीं है। ”  क्या कुछ खर्च भी नहीं दिया। यह चौधरी साहब को बेइनसाफी है।”आप अगर दो रुपया दे दें तो मैं उन्हें दे आज इतने में शायद वह घर पहुँच जाएँ|

पिताजी ने तीव्र दृष्टि से देखकर कहा, “जाओ अपनी किताब देखो मेरे पास रुपए नहीं हैं।” यह कहकर वह घोड़े पर सवार हो गएउसी दिन से पिताजी पर से मेरी अदा उठ गई। मैंने फिर कभी उनकी डटडपट की परवाह नहीं की। मेरा दिल कहता’आपको मुझको उपदेश देने का कोई अधिकार नहीं है।मुझे उनकी सूरत से चिढ़ हो गई। वह जो कहते, मैं ठीक उसका उलटा करता। यद्यपि इसमें मेरी हानि हुई। लेकिन मेरा अंतकरण उस समय विप्लवकारी विचारों से भरा हुआ था।

मेरे पास दो आने पड़े हुए थे। मैंने उठा लिये और जाकर शरमातेशरमाते रामचंद्र को दे दिएउन पैसों को देखकर रामचंद्र को जितना हर्ष हुआ, वह मेरे लिए आशातीत था। टूट पड़े, मानो प्यासे को पानी मिल गया।

यही दो आने पैसे लेकर तीनों मूर्तियाँ विदा हुई। केवल मैं ही उनके साथ कस्बे के बाहर तक पहुँचाने आया | उन्हें विदा करके लौटा तो मेरी आंखें सजल थीं, पर हदय आनंद से उमड़ा हुआ था।

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